मंगलवार, 23 मई 2017

आपको श्रीमन् नित्यानन्द प्रभु का मन्त्र शिष्य भी कहा जाता है।

श्रील वृन्दावन दास ठाकुर जी ने परम पतित पावन श्रीनित्यानन्द प्रभु की कृपा प्राप्त की थी, इसलिए आपको श्रीमन् नित्यानन्द प्रभु का मन्त्र शिष्य भी कहा जाता है।

आपने 1457 शकाब्द में 'श्रीचैतन्य भागवत' नामक अतुलनीय ग्रन्थ की रचना की थी।

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी जी ने श्रीचैतन्य चरितामृत में लिखा --

श्रीचैतन्य लीलार व्यास-दास वृन्दावन ।
मधुर करिया लीला करिला रचन॥  (चै-चै-आ / 48)
अर्थात् श्रीवृन्दावन दास ठाकुर सनातन धर्म के मूल गुरु श्रीकृष्ण द्वैपायन वेद व्यास जी के अवतार हैं । इस अवतार में आपने जो श्रीचैतन्य महाप्रभु की लीला का वर्णन किया है उसे अति मधुर और अतुलनीय कहना होगा। ग्रन्थ रचना के समय श्रीनित्यानन्द प्रभु जी की लीला वर्णन करने में ही खो जाने से कारण श्रीवृन्दावन दास ठाकुर जी ने श्रीचैतन्य महाप्रभु जी की किसी किसी लीला का सूत्र रूप में ही वर्णन किया है। विशेषतः श्रीचैतन्य महाप्रभु जी की अन्तिम लीला असम्पूर्ण रह गयी। श्रील वृन्दावन दास ठाकुर जी द्वारा जो सूत्र रूप में वर्णित है, और श्रीचैतन्य महाप्रभु जी की असम्पूर्ण अन्तिम लीला को ही श्रीचैतन्य चरितामृत में विस्तार रूप से वर्णन किया है।

ग्रन्थ विस्तार भय छाड़िला ये ये स्थाने।
सेइ सेइ स्थाने किछु करिब ब्याख्याने॥ (चै-चै-आ / 49)

अतः श्रीमन् नित्यानन्द प्रभु एवं श्रीमहाप्रभु की सम्पूर्ण लीलाओं के रसास्वादन के लिए हमें श्रील वृन्दावन दास ठाकुर द्वारा रचित श्रीचैतन्य भागवत तथा श्रील कृष्ण दास कविराज गोस्वामी द्वारा रचित श्रीचैतन्य चरितामृत ग्रन्थों को पढ़ना चाहिए।

श्रील वृन्दावन दास ठाकुर जी की जय !!!!!!!

सोमवार, 22 मई 2017

Message by Swami B.A. Paramadvaiti

I have received with great pain the wonderful news that our dear Guru Ji went back to the Nitya Lila of Sri Sri Radha Krishna. There is no comparison to how merciful he was--we lost a saint and the World Vaishnava Association lost its President as well. A service he held for more than 15 years. 

All of the devotee members of the Vrinda Family offer their obeisances to Param Pujyapad Srila Bhakti Ballabh Tirth Goswami Maharaj and to all of his beloved God brothers and disciples. Now he can reunite with his beloved Srila Gurudeva Param Pujyapad Srila Bhakti Dayita Madhav Goswami Maharaj. 

Please note that in all our temples around the world, we will simultaneously conduct a festival for his disappearance on the same day the festival is being held in Mayapur. 

Aspiring to be the servant of the servant of the servants. 

Swami B.A. Paramadvaiti

इस अद्भुत समाचार को सुनकर मेरा हृदय विरह-वेदना से कराह उठा कि श्रील गुरुदेव, भगवान श्रीश्री राधा कृष्ण जी की नित्य लीलाओं में प्रवेश कर गये हैं।  विश्व ने एक महान संत को खो दिया, जबकि विश्व वैष्णव राजसभा ने अध्यक्ष को। आपने विश्व वैष्णव राज सभा की अध्यक्ष रूप से पंद्रह वर्ष तक सेवा की। 

आप अति कृपालु थे।

वृन्दा परिवार के सभी भक्त परमपूज्यपाद श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराजजी को शत्-शत् प्रणाम करते हैं। साथ ही आपके गुरु-भाईयों तथा शिष्यों को भी प्रणाम करते हैं।  अब आप भगवान की नित्य लीलायों में अपने प्यारे गुरुदेव नित्यलीला प्रविष्ट परमपूज्यपाद श्रीश्रीमद् भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज 'विष्णुपाद' जी के पास चले गये हैं।

हमारी संस्था के सभी केन्द्र आपका एक ही दिन एक ही समय, सभी जगहों पर मनायेंगे। ये उसी दिन मनाया जायेगा जिस दिन आपका श्रीधाम मायापुर में यह उत्सव होगा।

भगवान की सेवा में,
स्वामी बी. ए. परमाद्वैति

जब भगवान जगन्नाथ जी आपके लिये युद्ध लड़ने गये

भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभुजी के भक्त थे, ओड़ीसा के राजा प्रतापरुद्र। उनके समय में उनका राज्य वर्तमान आन्ध्रप्रदेश के राजमहेन्द्री नामक 
स्थान तक फैला हुआ था।

राजा प्रतापरुद्र के पिता श्रीपुरुषोत्तम देव भगवान श्रीजगन्नाथ देवजी के अनन्य-शरण भक्त थे।

जब श्रीपुरुषोत्तम देव के साथ कान्ची नगर की राजकुमारी पद्मावती का विवाह निश्चित हुआ तो कान्ची के राजा वर को मिलने के लिये पुरी आये। वो भगवान जगन्नाथ जी की रथ-यात्रा का दिन था।  राजा पुरुषोत्तम देव सोने के झाड़ू से रथ का रास्ता साफ कर रहे थे। लगभग उसी समय कान्ची के राज वहाँ पर पहुँचे और उन्होंने सारा दृश्य देखा।

ऐसा देख कर कान्चीराज ने सोचा कि वे एक झाड़ूदार चाण्डाल के साथ अपनी कन्या का विवाह नहीं करेंगे। यह विचारकर उन्होंने विवाह की बात तोड़ दी।

कांची के राजा गणेश जी के भक्त थे। उनकी जैसी श्रद्धा गणेशजी में थी, वैसी श्रद्धा भगवान जगन्नाथजी में नहीं थी।

श्रीपुरुषोत्तम देव को जब अश्रद्धा की बात मालूम हुई तो वे क्षुब्ध हो उठे और एक बड़ी सेना लेकर उन्होंने कान्चीराज पर आक्रमण कर दिया। किन्तु वे युद्ध हार गये।

हार से हताश होकर वे भगवान जगन्नाथदेव जी को मिलने गये और उनके शरणागत हो गये। जब हार के कारण की जिज्ञासा की तो भगवान जगन्नाथदेव जी ने उनसे पूछा कि क्या वे युद्ध में जाने से पहले भगवान से आज्ञा लेने आये थे?

अपनी गलती को मानते हुये राजा ने पुनः भगवान जगन्नाथ जी से आज्ञा मांगी। भगवान जगन्नाथजी के द्वारा ये आश्वासन देने पर कि वे युद्ध में राजा की सहायता करेंगे, राजा ने युद्ध कि तैयारी प्रारम्भ कर दी व भगवान जगन्नाथजी को प्रणाम कर, कुछ ही दिनों में कान्ची नगर की ओर कूच 

कर दिया।
जब उनकी सेना पुरी से 12 मील दूर आनन्दपुर गाँव पहुँची तो एक ग्वालिन ने उनका रास्ता रोका। जिज्ञासा करने पर उसने राजा से कहा -' आपकी सेना के दो अश्वरोही सैनिकों ने उससे दूध-दही और लस्सी पी। जब मैंने पैसे मांगे तो उन्होंने मुझे एक अंगूठी दी और कहा कि ये अंगूठी राजा को दे देना और मूल्य ले लेना। ऐसा बोल कर वो दोनों आगे चले गये।'

राजा पुरुषोत्तम देव कुछ चकित हुये व ग्वालिन से अंगूठी दिखाने के लिये कहा। ग्वालिन ने राजा को वो अंगूठी दे दी। अंगूठी देखकर पुरुषोत्त्म देव को समझने में देर नहीं लगी, के वे दोनों सैनिक श्रीजगन्नाथ और श्रीबलराम जी को छोड़ क्र कोई दूसरा नहीं है।

राजा ने गवालिन को उपयुक्त पुरस्कार दिया।

जब राजा कान्ची नगर पहुंचा तो वहाँ सब कुछ पहले ही नष्ट हो चुका था।

युद्ध जय कर, कान्चीराज के मणियों से बने सिंहासन को राजा ने भगवान जगन्नाथदेव जी को अर्पित कर दिया।
कान्चीराज युद्ध में पराजय के बाद अपनी कन्या को स्वयं पुरी लेकर आये एवं रथ यात्रा के समय स्वर्ण के झाड़ू से स्वयं रथ का रास्ता साफ करते हुये उन्होंने अपनी कन्या पुरुषोत्तम देव के हाथों में समर्पण कर दी।

बुधवार, 17 मई 2017

Sri Krishna Chaitanya Mission opens Preaching centers in Africa

by Chaitanya Chandra das
Dear accept my humbly obeisance all glories to Krishna and Vaishnavas
By the mercy of Gurudev BHAKTI VICHAR BISHNU MAHARAJ, I wish to inform the Vaishnava community, that we are opening a center in Africa, means Sri Krishna Chaitanya Mission is now in Africa in Democratic Republic of Congo and Uganda kampala.
श्रील भक्ति विचार बिष्णु महाराज जी की कृपा से, श्रीकृष्ण चैतन्य मिशन अफ्रिका के Democratic Republic of Congo तथा  Uganda kampala में अपने प्रचार केन्द्र खोलने जा रहा है। यह सूचना श्रीचैतन्य चन्द्र दास जी ने दी।

सोमवार, 15 मई 2017

जब आप चिता से उठकर पुनः मठ में चले आये

श्रीचैतन्य महाप्रभु जी के प्रिय पार्षद श्रीवक्रेश्वर पण्डित के शिष्य थे श्रीगोपाल गुरु गोस्वामी जी। आप श्री काशी मिश्र जी का निवास स्थान, जो गम्भीरा के नाम से प्रसिद्ध है, उसमें भगवान श्रीराधाकान्त जी की सेवा करते थे। आपकी अपूर्व नाम-निष्ठा देखकर ही श्रीमहाप्रभु जी ने आपको 'गुरु' की उपाधि से विभूषित किया था।  
आप की जब वृद्धावस्था आ गई तब श्रीमहाप्रभु जी ने स्वप्न में आकर, आपको श्रीराधाकान्त जी की सेवा के लिए,  श्रीध्यान चन्द्र गोस्वामी को नियुक्त करने का आदेश दिया ।

बहुत समय के बाद जब आपने शरीर छोड़ा, उस समय आपको श्मशान ले जाया गया। अभी सभी लोग वहाँ पहुँचे ही थे कि राधाकान्त मठ पर राजकर्मचारियों ने कब्ज़ा कर लिया।

श्रीध्यानचन्द्र जी को सेवा से वन्चित होता जान श्रीगोपालगुरु जिवित हो चिता से उठकर पुनः मठ में चले आये । राजपुरुष इस अलौकिक घटना को पहले से ही जान गये थे, और श्रीगोपाल-गुरु के आने से पहले ही श्रीराधा-कान्त जी का मन्दिर खोल कर वहाँ से भाग गये।   और राजविधि के अनुसार मठ का सेवा-भार श्रीध्यानचन्द्र को अपने हाथों सौंप दिया, फिर शरीर त्यागा।

मरणोपरान्त बहुत दिन पीछे पुरी से आये भक्तों ने वृन्दावन में वंशीवट पर आपको भजन करते हुए बैठे देखा। जब पुरी में श्रीध्यानचन्द्र जी को पता लगा तो वे दौड़े-दौड़े वृन्दावन आये और आपके चरणों में गिर पड़े। तब आपने अप्नी दारुमूर्ति स्थापन करने का आदेश देकर उन्हें पुरी भेज दिया।

श्रीध्यानचन्द्र गोस्वामी जी की जय !!!!!

श्रीगोपाल गुरु गोस्वामी जी की जय !!!

श्रीचैतन्य महाप्रभु जी की जय !!!

भगवान राधा-कान्त जी की जय !!!!!