बुधवार, 22 फ़रवरी 2017

हम इस दावे को सत्य मानते हैं

परमेश्वर के रूप में श्रीकृष्ण यहाँ कभी भी प्रकट हो सकते हैं और हम आपत्ति उठाकर यह नहीं कह सकते कि वे क्यों आये। वे परम स्वतन्त्र हैं और इच्छानुसार जब चाहें तब आ सकते हैं। और अन्तर्धान हो सकते हैं।  यदि राज्याध्यक्ष बन्दीगृह देखने जाता है तो हम यह नहीं कह सकते कि वह बाध्य होकर आया होगा। श्रीकृष्ण सोद्देश्य आते हैं, पतित एवं बाद्धजीवों का उद्धार करने के उद्धेश्य से। श्रीकृष्ण को हम नहीं, अपितु श्रीकृष्ण हमें प्यार करते हैं। वे प्रत्येक प्राणी को अपना पुत्र मानते हैं। 

सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः।
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता॥ (श्रीगीता -- 14/4)

अर्थात्, हे कुन्तिपुत्र! सब प्रकार की योनियों में जितने भी शरीर उत्पन्न
होते हैं, उन सबका उत्पत्ति स्थान तो यह प्रकृति है और मैं बीजदाता पिता हूँ। 

पिता पुत्र के प्रति सदैव वत्सल होता है। पुत्र भले ही पिता को भूल जाय, किन्तु पिता अपने पुत्र को कभी नहीं भूल सकता। हमें जन्म तथा मृत्यु के क्लेशों से उबारने के लिये श्रीकृष्ण इस भौतिक ब्रह्माण्ड में प्रेमवश अवतरित होते हैं। वे कहते हैं -- मेरे पुत्रो! तुम इस दुखःमय संसार में क्यों सड़ रहे हो? मेरे पास आओ। मैं सब प्रकार से तुम्हारी रक्षा करूँगा।

हम भगवान के पुत्र हैं और क्लेश तथा सन्देह के बिना, ठाठ से जीवन का
उपभोग कर सकते हैं। अतः हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि हमारी तरह श्रीकृष्ण भी प्रकृति के नियमों के वशीभूत होकर आते हैं। 

संस्कृत शब्द अवतार का शाब्दिक अर्थ है 'जो उतरता है'। जो स्वेच्छा से आध्यात्मिक ब्रह्माण्ड से इस भौतिक ब्रह्माण्ड में उतरता है वह अवतार कहलाता है। कभी श्रीकृष्ण स्वयं अवतरित होते हैं और कभी वे अपने प्रतिनिधि भेजते हैं। संसार के प्रमुख धर्म -- हिन्दु, बौद्ध, क्रिस्तानी तथा मुस्लिम -- किसी न किसी परम सत्ता या पुरुष को ईश्वर के धाम से अवतार लेते मानते हैं। क्रिस्तानी धर्म के जीसस क्राइस्ट को ईश्वर का पुत्र
माना जाता है जो बद्धजीवों के उद्धार हेतु ईश्वर के धाम से आते हैं। श्रीभगवद् गीता के अनुयायी होने के कारण हम इस दावे को सत्य मानते हैं। अतः मूलरूप से कोई मत-मतान्तर नहीं है। विस्तार में जाने पर संस्कृति, जलवायु और निवासियों में अन्तर के कारण कुछ अन्तर भले ही पाया जाये, किन्तु मूल सिद्धान्त जैसे का तैसा रह जाता है कि ईश्वर या उससे प्रतिनिधि बद्धजीवों को उबारने के लिए आते रहते हैं। 

--- श्रील ए. सी. भक्ति वेदान्त स्वामी महाराज (संस्थापक, इस्कान)

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017

प्रसाद ज़मीन पर रख कर खिलाते देख, आप बहुत हैरान हुए…

श्रील भक्ति सिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर प्रभुपाद एक दिन दोपहर में अपने कमरे से बाहर आये। बाहर आकर आपने देखा की सब के लिए प्रसाद जमीन पर ही लगाया गया है, नीचे पत्तलें नहीं हैं। आप बहुत हैरान हुये व उन्होंने मठ के सेवक को पूछा की प्रसाद ऐसे क्यों खिलाया जा रहा है ?

सेवक ने उत्तर दिया की कल रात बहुत तेज आँधी-तूफान आने से केले के सभी पत्ते फट गये, इसलिए प्रसाद बिना केले के पत्ते बिछाये, ज़मीन पर ही खिलाया जा रहा है ।


श्रील प्रभुपाद के मन में बहुत दुःख हुआ की ये सब जन, अपना घर-बार छोड़ कर मेरे लिए आये और मैं इनको प्रसाद खाने के लिए पत्तलें भी नहीं दे सकता।

बात धीरे-धीरे फैल गयी।

श्रील भक्ति सारंग गोस्वामी महाराज जी (तब आपका संन्यास नहीं हुआ था, व आप अभी घर पर ही थे) को जब यह बात पता चली तो आपने सोचा की अभी कुछ दिनों में भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभु का जन्मोत्स्व आयेगा, तब क्या होगा? 
आप उसी समय कोलकाता चले गये। एक धनी सेठ से मिले, कृष्ण - कथा से उसे इतना प्रभावित कर दिया कि उसने मठ के लिये सेवा स्वीकार कर, एक ट्रक भर के अनाज, फल इत्यादि भेजा। साथ ही साथ आपने 1000 प्लेट, कटोरी, गिलास, इत्यादि की भी व्यवस्था की।ऐसे प्रतिभाशाली थे आप ।

मठ के लिये चन्दा - सेवा इकट्ठे करने वाले प्रमुख तीनों सेवकों में से एक थे श्रील भक्ति सारंग गोस्वामी महाराज जी।

गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

आप पर सांप के विष का कोई असर नहीं हुआ।

श्रीकृष्ण लीला में श्रीदाम नामक गोप बालक ही श्रीचैतन्य महाप्रभु जी की लीला में श्रील पुरुषोत्तम दास के रूप में आये। आपने ब्रज - धाम में भगवान श्रीकृष्ण के साथ बहुत सी बाल्य-क्रीड़ायें कीं थीं।

आप श्रीकृष्ण की प्रेम लीलाओं में ही मग्न रहते थे।


एक बार उसी अवस्था में आपने सांप का विष खा लिया था। उस विष का आप पर कोई असर नहीं हुआ था। आपकी अद्भुत अलौकिक शक्ति को देख कर सभी हैरान हो गये थे।

आप श्रीनित्यानन्द प्रभु के मुख्य पार्षदों में गिने जाते हैं। श्रीनित्यानन्द प्रभु जी के पार्षदों में इस प्रकार की अलौकिक शक्ति देखी जाती है।
श्रील पुरुषोत्तम ठाकुर की जय !!!!

भक्त भगवान की सेवा करते हैं, भगवान से अपनी सेवा नहीं कराते।

माघ का महीना था, एक दिन अचानक जगद्गुरु श्रील भक्ति सिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर प्रभुपाद जी की इच्छा हुई की भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभुजी को आम का भोग लगाया जाये।

श्रील प्रभुपाद तुरन्त खेद करने लगे कि शायद मेरे अन्दर आम खाने की इच्छा थी, इसलिये मेरी ऐसी इच्छा हुई। ऐसा सोच कर आप बहुत दुःखी हुये। बंगाल में मायापुर, जहाँ पर आप रह रहे थे, शहर से काफी दूर है। माघ के महीने में आम नहीं मिलते। हाँ, बड़े-बड़े शहरों में बड़ी मुश्किल से कदाचित आम पाये जा सकते थे। श्रील प्रभुपाद जी ने अपने मन की बात किसी से न कही।

थोड़ी देर बाद श्रील प्रभुपाद जी के नाम एक पार्सल आया। जब उसे खोला गया तो उसमें में बड़े सुन्दर - सुन्दर आम निकले। सबको बड़ा आश्चर्य हुआ। श्रील प्रभुपाद की आँखें भर आयीं।

आप ने रोते-रोते कहा - हे मेरे प्रभु! मैंने आपको कष्ट दिया। आपने इस समय में भी न जाने कहाँ से आम भेज दिये हैं। 

आपने उसी समय मन्दिर के पुजारी को आम दे दिये और भोग लगाने को कहा।

भोग लगने के बाद, आम का प्रसाद सबको बाँटा गया।
उस दिन से श्रील प्रभुपाद जी ने आम न खाने का संकल्प लिया और जीवन भर आम नहीं खाये। श्रील प्रभुपाद जी की ऐसी भावना हुई कि इन आमों के लिये मेरे प्रभु को कष्ट उठाना पड़ा।

भक्त भगवान की सेवा करते हैं, भगवान से अपनी सेवा नहीं कराते।

आत्मेन्द्रिय प्रीतिवाञ्छा तारे बलि काम।
कृष्णेन्द्रिय प्रीति-इच्छा धरे प्रेम नाम॥

मंगलवार, 14 फ़रवरी 2017

अखिल भारतीय श्रीचैतन्य गौड़ीय मठ - यूरोपीय देश - भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभुजी की वाणी का प्रचार

श्रीभक्ति विचार विष्णु महाराजजी (अखिल भारतीय श्रीचैतन्य गौड़ीय मठ के ज्वाइन्ट सेक्रेटरी) इन दिनों यूरोपीय देशों की यात्रा पर हैं।

वे वहाँ पर भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभुजी की भगवान के दिव्य प्रेम की वाणी के प्रचार के लिये गये हैं। उनके साथ श्रीहरिवल्लभ दास जी भी हैंं। महाराज जी, फ्रांस के श्री लेमोइन गुइलौम के आमन्त्रण पर गये। महाराज जी ने फ्रांस के पैरिस, रोउन और डिजौन में सफल कार्यक्रम किये। 

डिजौन में श्री लेमोइन गुइलौम ने दो विशाल जनसभाओं का आयोजन किया। बहुसंख्या में भक्त-लोग इसमें भाग लेने आये व महाराजजी के विचार सुनने आये। 'Attaining peace in the present times of chaos' and 'Successful life' इत्यादि विषयों पर चर्चा हुई। 

महाराजजी ने निति शास्त्र से उदाहरण देते हुये बताया कि -----      जीवन में सभी सुख के लिये भाग रहे हैं। दुनियाँ के जितने भी कार्य हैं, वे सभी व्यक्तिगत सुख की चाह में ही किये जा रहे हैं। किन्तु ऐसा देखा जाता है कि पूरा-पूरा जीवन बिता देने पर, पूरा जीवन दुनियाँं की सभी वस्तुयें इकट्ठी कर लेने पर भी उन वस्तुओं के सुख-आनन्द से मानव वंचित है। आखिर ऐसा क्यों है? 

इसका कारण है पुण्यों का अभाव। पुण्य का भंडार होने से दुनियावी सुख अपने-आप मनुष्य की झोली में आने लगते हैं। थोड़ी मेहनत से ही बड़े-बड़े फायदे हो जाते हैं। इसलिये पुण्य इकट्ठे करते रहने चाहिये। पुण्य इक्ट्ठे होते हैंं, दूसरों की सयहता करने से, माता-पिता की सेवा करने से, दूसरों पर दया करने से, सबका सम्मान करने से, इत्यादि। इसमें एक बात और है। वो ये की पुण्य आपको दुनियावी सुख तो दे सकते हैं किन्तु वे सुख नित्य नहीं होते। आते-जाते रहते हैं। अब इन सुखों को नित्य कैसे किया जाये? कैसे ये सदा के लिये हमारे हो जायेंगे? क्यों ये हमसे लुका-छिपी करते रहते हैं?

इसका कारण है, सुखमय वस्तु के संग का अभाव। सुखमय वस्तु कौन हैं? एकमात्र भगवान जी सुखमय वस्तु हैं। वे ही सुख के सागर हैं। वे ही आनन्द के स्रोत हैं। संसार की कोई भी वस्तु स्थाई सुख अथवा स्थाई आनन्द नहीं दे सकती। इसलिये मनुष्य को चाहिये कि वो भगवान को प्राप्त करने के लिये प्रयत्न करे। अगर व्यक्ति अपने जीवन में सुख के सागर भगवान को प्राप्त करने में सफल हो जाता है तो उसे स्थाई सुख-आनन्द तो प्राप्त होगा ही, साथ ही उसकी जीवन की जितनी भी अभिलाषायें हैं, वे भी पूर्ण हो जायेंगी, क्योंकि भगवान सर्व-शक्तिमान हैं, वे सब कुछ दे सकते हैं। 

भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद् भगवद् गीता में स्पष्ट रूप से बताया है कि उनको प्राप्त करने का तरीका क्या है? भगवान ने कहा - मामेंकं शरणम् व्रजः। अर्थात् मेरी शरण में आ जायो।

महाराजजी इन दिनों बर्लिन (जर्मनी) के भक्तों पर कृपा कर रहे हैं। इसके बाद महाराजजी प्राग तथा विएना भी जायेंगे।