बुधवार, 16 अगस्त 2017

ऐसा स्थान जहाँ भगवान मदनमोहनजी का प्रेम मिल सकता है।

श्रीचैतन्य महाप्रभुजी के पार्षद, षड़गोस्वामियों में से एक अर्थात् श्रील सनातन गोस्वामीजी कुछ दिन गोकुल महावन में रहे थे। वृजवासी श्रील सनातन गोस्वामीजी को अत्यन्त श्रद्धा की दृष्टि से देखते थे और उन्हें अत्यन्त प्रिय और प्राणस्वरूप समझते थे। 

गोकुल महावन की रमण-रेति में नन्दनन्दन मदन गोपाल जी गोप-शिशुओंं के खेलते थे। 

एक दिन श्रील सनातन गोस्वामीजी ने भक्तिमय नेत्रों से भगवान की इस लीला का दर्शन किया और प्रेमानन्द में विभोर हो गये। 

उन्होंने विचार किया कि गोपशिशुओं के साथ खेल में रत अपार रूपलावण्य विशिष्ट शिशु साधारण शिशु नहीं है। एक दिन खेल समाप्त कर शिशु के वापस जाने पर श्रील सनातन गोस्वामीजी उसके पीछे-पीछे चलने लगे। वह शिशु एक मन्दिर में प्रवेश कर आँखों से ओझल हो गया। श्रील सनातन गोस्वामीजी ने मन्दिर में शिशु को न देख, श्रीमदन मोहन जी को देखा। वे मदनमोहन जी को प्रणाम कर वापिस आ गये। 

श्रीमदन मोहन जी तो श्रील सनातन गोस्वामीजी के प्रेम के अधीन हैं -- ये
बात चारों ओर फैल गई। 

माधुकरी (भिक्षा) पर जीवन धारण करने वाले श्रील सनातन गोस्वामीजी ने वृन्दावन में श्रीमदनमोहनजी का विशाल मन्दिर निर्माण करवाकर उनके लिये राज सेवा की व्यवस्था की थी। म्लेच्छों के अत्याचार होने पर श्रीमदनमोहनजी पहले भरतपुर तथा बाद में जयपुर और उस के बाद करोली में जाकर रहे हैं।

रमणरेति में जिनके दर्शन होते हैं वे रमणबिहारी राधा-मदन-मोहन जी हैं। 

चिराचरित प्रथानुयायी लोग वहाँ जाकर रेति में लोट-पोट होते हैं किन्तु न जाने अप्राकृत धाम की अप्राकृत रेत को स्पर्श करने का सौभाग्य कितनों का होता है? स्पर्श होने से तो श्रीमदनमोहन जी के प्रति प्रेम उदय और उनके अतिरिक्त अन्य विषयों की प्रवृति विनष्ट हो जाती है।

मंगलवार, 15 अगस्त 2017

भगवान श्रीकृष्ण की प्राप्ति में बाधा क्या है?

एक दिन भगवान श्रीकृष्ण - श्रीबलराम गोचारण के समय बछड़ों और गोपबालकों के साथ भ्रमण करते-करते एक जलाशय के पास पहुँचे।

गोपबालकों और बछड़ों को बहुत प्यास लगी हुई थी। अतः उस जलाशय का जल पीने लगे कि तभी कंस का भेजा हुआ एक भयंकर असुर वहाँ आ गया। उसका नाम था बकासुर्। 
उसे देखकर सभी भयभीत हो गये। बकासुर उनके पास आया और गोप बालकों के सामने अपन मुँह खोल कर श्रीकृष्ण को निगल गया। ऐसा भयंकर दृश्य देखकर श्रीबलदेव व गोपबालक प्राणः शून्य हो गये। भक्त आर्तिहर श्रीकृष्ण जब उस बगुले रूपी बकासुर के तालु के नीचे पहुँचे तो आग के समान उसका तालु जलाने लगे। 

बक ने घबराकर श्रीकृष्ण को वमन कर बाहर निकाल दिया। किन्तु जब दूसरी बार फिर निगलने के लिए आया तो श्रीकृष्ण ने उसकी दोनों चोंच को चीर कर उसका वध कर दिया। 
प्रत्येक प्राणी के हृदय में स्थित बकासुर का जब तक वध नहीं हो जाता तब तक श्रीकृष्ण को प्राप्त नहीं किया जा सकता व श्रीकृष्ण भक्ति की प्राप्ति नहीं होती। 

श्रील भक्ति विनोद ठाकुर जी के अनुसार बकासुर 'खुटिनाटि' धूर्तता और 'शाठ्य' का प्रतीक है। धूर्तता और शठता श्रीकृष्ण की प्राप्ति में बाधा हैं। 

सोमवार, 14 अगस्त 2017

जब भगवान ने श्रीमती राधा जी से शुल्क मांगा।

एक बार श्रीवसुदेव जी ने श्रीबलदेव और श्रीकृष्ण जी के लिये गर्ग ॠषि के दामाद श्रीभागुरी को प्रतिनिधि के रूप में नियुक्त करते हुये गिरिराज गोवर्धन के नीचे अवस्थित गोविन्द कुण्ड के तट पर यज्ञानुष्ठान किया। इस यज्ञानुष्ठान की खबर जब चारों तरफ फैल गई तो श्रीवृषभानुनन्दिनी श्रीमती राधारानी गुरुजनों की आज्ञा लेकर सखियोंके साथ मक्खन बेचने के लिये उक्त यज्ञमण्डप की ओर चल पड़ीं।

इधर श्रीकृष्ण को पहले ही मालूम हो गया कि श्रीमती राधा रानी और उनकी गोपियाँ यज्ञमण्डप की ओर जा रही हैं। अतः वे शुल्क लेने के लिये सखाओंके साथ गोवर्धन में दान घाट के रक्षक के रूप में रास्ता रोक कर बैठ गए। वे जिस स्थान पर बैठे, उसे 'कृष्ण वेदी' कहते हैं। 
जब श्रीमती राधाजी सखियों के साथ वहाँ पहुँचीं तो श्रीकृष्ण शुल्क लेने वाले का वेश बनाकर उनसे राजा मदन को प्राप्त होने वाले पदार्थोंं को शुल्क के रूपे में देने के लिए ज़ोर देने लगे। इसी बात को लेकर दोनों में भीषण वाद-विवाद व झगड़ा आरम्भ हो गया। 
श्रीकृष्ण ने सखाओं को साथ लेकर रास्ता रोके रखा। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि जब तक वे मक्खन इत्यादि नहीं देंगी तब तक वे राधा रानी और गोपियों को जाने नहीं देंगे। जब झगड़ा चरम सीमा तक पहुंच  गया तब श्रीपौर्णमासी के बिच में पड़ने पर किसी प्रकार झगड़ा निपटा।
श्रील रूप गोस्वामी जी द्वारा रचित दान-केलि-कौमुदी में यह लीला विस्तृत रूप से वर्णित है।

रविवार, 13 अगस्त 2017

किसे कहते हैं मायावादी?

भगवान, भगवान का भजन करने वाले तथा भगवान का भजन -- ये तीनों नित्य हैं।

इसी प्रकार भगवान के नित्य स्वरूप, उनके नाम, उनके रूप - गुण - लीला का भी नित्यत्व स्वीकार हुआ है।

मायावादी ज्ञानी-सम्प्रदाय के आचार्यों ने भगवान के नित्य चिन्मयस्वरूप एवं उनके नाम-रूप-गुण लीला आदि के नित्यत्व और चिन्मयता को स्वीकार  नहीं किया है। वे इन सबको मायिक समझते हैं। 'माया' रूपी 'वाद' की अवतारणा करने के कारण उन्हें मायावादी कहा जाता है।

वे इस प्रकार से कहते हैं कि निम्न स्तर के साधकों के हित के लिए ही ब्रह्म के रूप की कल्पना की गयी है। 

उनके विचार में निराकार, निर्विशेष, निःशक्ति ब्रह्म ही चरम तत्त्व है। एक ब्रह्म को छोड़ कर और कुछ भी नहीं है और जीव ही ब्रह्म है। 

मायावादी लोगों का विचार है कि ब्रह्म में लीन होने की अवस्था को प्राप्त करने के लिये ही निम्न-स्तर के व्यक्तियों को भक्ति का पथ स्वीकार करना पड़ता है। चरम अवस्था में भक्ति का कोई अस्तित्व नहीं है। 

इस प्रकार के विचार पंचम पुरुषार्थ-भगवत्प्रेम की प्राप्ति में बहुत बड़ी बाधा हैं। इसीलिए श्रीमन्मध्वाचार्य, श्रीरामानुजाचार्य, श्रीविष्णुस्वामी व श्रीनिम्बार्काचार्य -- चारो वैष्णव आचार्यों ने श्रीशंकराचार्य जी के विवर्तवाद विचार, अर्थात् मायावाद विचारों का खण्डन किया।

श्रीकृष्ण द्वैपायन वेद्व्यास मुनि जी का शक्ति-परिणामवाद विचार,
वैष्णवों एवं नित्य मंगल चाहने वालों के लिए ग्रहण करने योग्य है। 

महावदान्य श्रीचैतन्य महाप्रभुजी बिना ऊँच-नीच के भेद-भाव के, सभी को उन्नत-उज्जवल रस-मधुर रस के अन्तर्गत श्रीकृष्ण सेवा प्रदान करने के लिए ही धन्य कलियुग में अवतीर्ण हुए,  जो कि किसी युग में नहीं दिया गया। श्रीमन् चैतन्य महाप्रभुजी ने उसी सर्वोत्म प्रेम को बिना योग्यता-अयोग्यता देखे सब को दिया। 

भगवान की प्राप्ति की बाधा-स्वरूप तमाम सांसारिक वासनाओं का नाश कर प्रत्येक जीव के हृदय में भगवत् प्रेम की प्रतिष्ठा के लिए श्रीचैतन्य महाप्रभुजी इच्छा और शक्ति लेकर आविर्भूत हुए।

मायावाद-विचार, भगवत्-प्रेम प्राप्ति में बहुत बड़ी रुकावट है। 

सोमवार, 7 अगस्त 2017

जब एक असुर ने श्रीबलराम को उठा लिया।

श्रीमद् भागवतम् के प्रथम स्कन्ध के 18वें अध्याय के अनुसार जब भगवान श्रीकृष्ण और भगवान बलराम जी वृन्दावन में विहार करते थे तब ग्रीष्म काल में भी बसन्त ॠतु सा ही मौसम रहता था। 

एक दिन श्रीकृष्ण-बलराम गोप-बालकों के साथ खेल रहे थे। उस समय प्रलम्ब नामक असुर गोप-बालक का वेश धर कर उनके बीच में ही खेलने लगा। सर्वज्ञ श्रीकृष्ण समझ गये कि ये नया आया गोप एक असुर है। श्रीकृष्ण ने उसके वध का उपाय सोच उसे अपने सखा के रूपे में वरण कर लिया तथा आयु और बल के अनुरूप दल बनाकर खेल करने के लिये गोप-बालकों को दो दलों में बाँट दिया। 
एक दल के नायक बने -- श्रीकृष्ण और एक दल के नायक बने -- श्रीबलराम ।

खेल में ऐसी शर्त रखी गयी कि जो जिससे हारेगा वह उसे अपने कन्धों पर वहन करेगा। दोनों दल लाइन में खड़े हो गये। खेल आरम्भ होने के साथ-साथ श्रीबलराम के दल से श्रीदाम व वृषभ विजयी हुए। श्रीकृष्ण ने श्रीदाम को और श्रीकृष्ण के पक्ष के बालकों में से भद्रसेन ने वृषभ को कन्धे पर चढ़ा कर वहन किया। इस तरफ प्रलम्बासुर ने श्रीबलराम से हारकर उन्हें कन्धे पर बिठा लइया और श्रीकृष्ण की नज़रों से अपने आप को बचाता हुआ उल्टी तरफ तेज़ी से भाग खड़ा हुआ। 

श्रीबलराम असुरे के खराब अभिप्राय को समझ गये और उसके कन्धों पर
अधिक भार देने लगे। बलरामजी को वहन करने में असमर्थ हो जाने पर कपट गोपवेश धारी असुर ने अपना वास्तविक रूप धारण किया। असुर का भयंकर रूप देखकर बलदेवजी ने पहले तो शंका का भाव प्रकाश किया परन्तु बाद में यह स्मरण कर कि दैत्यों के वध के लिये ही उनका अवतार है, इन्द्र ने जैसे वज्रवेग से गिरि पर प्रहार किया था उसी प्रकार से निःशंकित चित्त से अपहरणकारी असुर के मस्त्क पर मुट्ठी से प्रहार किया। 

घूँसे के प्रहार से प्रलम्बासुर का मस्तक फट गया और खून की उलटी करते हुए भूमि पर गिरकर उसने प्राण त्याग दिये। 
श्रीबलराम के इस अलौकिक कार्य को देखकर गोपों तथा देवताओं ने साधुवाद प्रदान करते हुये उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। 

श्रीलभक्ति विनोद ठाकुरजी ने प्रलम्बासुर के वध के तात्पर्य के सम्बन्ध में लिखा है कि स्त्रीलाम्पट्य, लाभ, पूजा-प्रतिष्ठा का प्रतीक है प्रलम्बासुर्। श्रीबलराम जी की कृपा से इन अनर्थों के नाश होने से श्रीकृष्ण सान्निध्य प्राप्त करने की योग्यता आती है।