सोमवार, 5 जून 2017

किसे सुख का अनुभव होता है?

जो अपने जीवन को वृथा ही व्यतीत करना चाहते हैं तथा स्वेच्छाचारी होकर ही चलना चाहते हैं, उन्हें सद्गुरु का चरणाश्रय ग्रहण करने की क्या आवश्यकता है। जो अपनी गलतियों व अनर्थों को अनुभव कर सकते हैं एवं उनसे मुक्त होकर श्रीभगवद् - प्रेमानन्द के अधिकारी होने के इच्छुक हैं, केवल वे ही भगवद् - प्रेमिक साधु - भक्तों के आश्रय में रहते हैं। 

जो भगवान के अनन्य-भक्तों के आश्रय में, उनके आदेशों व उपदेशों के अनुसार चलते हुए अपनी स्वेच्छाचारिता को छोड़कर, इन्द्रियों को दमन करते हुए भगवान की सेवा में नियोजित रहते हैं, वे ही सुख का अनुभव कर सकते हैं।
जो केवल बाहर से श्रीगुरुपदाश्रय का अभिनय करते हुए स्वयं को नियन्त्रित व संशोधित (सुधार) करने का छल मात्र करते हैं किन्तु आन्तरिक रूप से अपने पूर्व अर्जित कुसंस्कारों व कुप्रवृतयों का पोषण करने में ही यत्नशील हैं, वह गुरुपदाश्रय के नाम पर अपने शिष्य बनाते हैं और उन शिष्यों के द्वारा निज स्वार्थों की पूर्ति के लिये प्रयासरत रहते हैं,ऐसे दम्भी या कपटी व्यक्तियों का मंगल होना बहुत दूर की बात है।

स्वयं शासित होने या नियन्त्रित होने के लिए ही शिष्यत्त्व ग्रहण करना होता है। 'अपना परमार्थ मैं अधिक जानता हूँ '-- इस प्रकार के अभिमान को लेकर केवल बाहरी रूप से श्रीगुरु-पदाश्रय करना विडम्बना, आत्मवन्चना व दूसरों के साथ छल करना मात्र है।

शुद्ध गौड़ीय वैष्णव इन सब की अपेक्षा उदार व सर्वोत्तम मंगल प्रदान करने वाले होते हैं। यदि हम उनके जीवन के आदर्शों का कोई  एक पहलू भी समझने की योग्यता प्राप्त कर सकें तो हम परमोल्लासित होकर साधन-भजन में तत्पर हो सकते हैंं।

-- श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज 'विष्णुपाद' जी के लेखों से।

रविवार, 4 जून 2017

'गोविन्द भाष्य'

एक समय की बात है जब प्रसिद्ध वैष्णव आचार्य श्रील विश्वनाथ चक्रवर्त्ती ठाकुर जी बहुत वृद्ध हो गये थे, और वृन्दावन में रह रहे थे। 

उस समय जयपुर के गलता नामक गाँव के श्रीरामानुज सम्प्रदाय के आचार्यों ने जयपुर के महाराजा को गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय का परित्याग करवा कर रामानुज सम्प्रदाय में लेने के लिये उनके सामने ये सिद्ध करने का प्रयास किया कि गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय चार प्रमाणिक सम्प्रदायों से बाहर है। इसके साथ - साथ उन्होंने जयपुर के महाराजा को पुनः रामनुज सम्प्रदाय में दीक्षा लेने का परामर्श दिया। 

इस प्रस्ताव से जयपुर के महाराज असमंजस में पड़ गये और उन्होंने वृन्दावन में रह रहे उस समय के प्रधान गौड़ीय वैष्णवाचार्य श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर जी के पास ये संवाद भेजा और जयपुर में आने के लिए उनसे प्रार्थना की। उस समय अतिवृद्ध होने व चल न पाने के कारण आपने अपने छात्र श्रील बलदेव विद्याभूषण प्रभु को जयपुर में जाकर गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय का सरंक्षण करने का निर्देश दिया।

श्रील बलदेव विद्याभूषण प्रभु, श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती पाद जी से श्रीमद् भागवत शास्त्र अध्ययन करते थे। 

श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर जी के शिष्य श्रीकृष्ण देव जी के साथ बलदेव विद्याभूषण प्रभु जी गुरु आज्ञा का पालन करने के लिये जयपुर में गलता ग्राम की गद्दी में हो रही विचार सभा में उपस्थित हुये।

चारों वैष्णव सम्प्रदायों का अपन-अपना भाष्य है किन्तु गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय का अपना वेदान्त भाष्य नहीं है । इसलिये रामानुजीय आचार्यों ने गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय की साम्प्रदायिक मर्यादा को स्वीकार नहीं करना चाहा तो श्रीबलदेव विद्याभूषण प्रभु ने गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय का वेदान्त का भाष्य लिखने के लिये सात दिन (किसी किसी के मत में तीन महीने) का समय मांगा।

रामानुजीय आचार्यों ने प्रार्थना के अनुसार समय दे दिया। 


श्रीबलदेव विद्याभूषण प्रभु जी ने श्रीगोविन्द जी के मन्दिर में श्रील गुरुदेव और श्रीगोविन्द देव जी से कृपा प्रार्थना करते हुये वेदान्त भाष्य लिखना आरम्भ किया। आपके गले मे, श्रीरूप गोस्वामी जी द्वारा सेवित श्रीगोविन्द देव जी की आशीर्वाद माला अर्पित की गयी। 

गुरु-वैष्णव-भगवान की कृपा से असम्भव भी सम्भव हो जाता है।

आपने वेदान्त के पांच सौ (500) सूत्रों के गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय के शुद्ध-भक्ति-रस-पूर्ण भाष्य को निर्धारित समय पर ही लिख कर पूरा कर दिया।

गलता गद्दी की सभा में आप के श्रीमुख से प्रेमपरक भाष्य सुन कर सभी चमत्कृत हो उठे।

श्रीगोविन्द जी के आदेश से वेदान्तसूत्रों का भाष्य रचित होने के कारण ये भाष्य 'गोविन्द भाष्य' के नाम से प्रसिद्ध हुआ। 

वेदान्त के गोविन्द भाष्य लिखे जाने के पश्चात ही श्रीबलदेव जी 'विद्याभूषण' की उपाधि से भूषित हुये।

कहा जाता है कि आपने गलता गद्दी पर 'विजय-गोपाल' नामक विग्रह की प्रतिष्ठा की थी।

आपके मना करने पर, भगवान ने स्वप्न में आकर सेवा करने का आदेश दिया

राजस्थान के जयपुर शहर में एक ब्राह्मण रहता था जिसका नाम था श्रीचन्द्र शर्मा। उसके घर में श्रीरसिक राय नाम के श्रीविग्रह थे (श्रीकृष्ण की मूर्ति) । किसी कारणवश उससे सेवा ठीक से नहीं हो पा रही थी।
ऐसे में भगवान जगन्नाथ जी, एक रात उसके स्वप्न में आये।  आपने उस ब्राह्मण से कहा -- तुम इन विग्रहों की सेवा पुरुषोत्तम धाम मे श्री गंगामाता जी को दे दो । इससे तुम्हारे सारे अपराध और भय दूर हो जाएंगे।

आदेश के अनुसार वो ब्राह्मण देव ,  श्रीमती राधा जी व श्रीरसिक राय विग्रहों को लेकर श्रीक्षेत्र में गगांमाता जी के पास पहुँचे । उन्होंने श्रीमती गंगा माता गोस्वामिनी जी  को श्रीविग्रह की सेवा के लिए प्रार्थना की।
पहले तो श्रीमती गंगा माता गोस्वामिनी जी ने उसे ग्रहण करना अस्वीकार कर दिया, कारण यह की, आपके लिए श्रीविग्रहों की राज-सेवा चलानी असम्भव थी, परन्तु बाद में वो ब्राह्मण द्वारा तुलसी के बगीचे में ही विग्रहों को छोड़कर चले जाने पर श्रीरसिक राय जी ने स्वयं ही अपनी सेवा के लिए गंगा माता जी को स्वप्न में आदेश दिया।

स्वप्न में आदेश मिलने पर गंगा माताजी ने उल्लास के साथ श्रीविग्रहों का प्रकट उत्सव मनाया।

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज जी ने अपनी रचना 'श्रीगौरपार्षद और गौड़ीयवैष्णाचार्यों का संक्षिप्त चरितामृत' में बताया है कि गंगामाता जी 1601 ई के ज्येष्ठ मास की शुक्लातिथि को आविर्भूत हुयीं तथा सन् 1721 ई में आपने नित्यलीला में प्रवेश किया।
आप श्रीगदाधर पण्डित गोस्वामी जी की शिष्य परम्परा में हैं। आप के पिताजी द्वारा दिया गया नाम था श्रीशची देवी'। आप बंगलादेश के राजशाही जिले के पुंटिया के राजा श्रीनरेशनारायण की कन्या थीं।

सोमवार, 29 मई 2017

1st International Bhagavata Mahotsava, Europe

From July 20th to 23rd, 2017 Goloka Dham, Germany
Dear devotees,
We have the pleasure of inviting you for a very special festival. A festival in which sravanam, hearing, will be the main focus. This hearing will not only be directly from the Srimad Bhagavatam, the ripe fruit of all vedic literature but also from that spoken by highly realized souls. Taking time out to just sit down and listen carefully to the transcendental glories of Lord Krsna will inspire and strengthen our spiritual journey. With the hope of serving the vaisnava community under the shelter of Sri Sri Radha Madana Mohan, we are honoured to organize such a festival.
“ Men become strong and stout by eating sufficient grains, but the devotee who simply eats ordinary grains but does not taste the transcendental pastimes of Lord Krsna gradually becomes weak and falls down from the transcendental position. However, if one drinks but a drop of the nectar of Krsna’s pastimes, his body and mind begin to bloom, and he begins to laugh, sing and dance.“ CC Madhya 25.278
प्यारे भक्तो,
हम आप सबको एक अद्भुत उत्सव में आमन्त्रण करना चाहते हैं, जिसमें मुख्यतः श्रवण करने के लिए बहुत कुछ होगा। केवल श्रीमद् भागवतम् ही नहीं अपितु भगवद् अनुभूति प्राप्त भक्तों के श्रीमुख से श्रवण करने का अवसर भी मिलेगा।  भगवान श्रीकृष्ण की अद्भुत लीलाओं को श्रवण करने से हमें आध्यात्मिक बल मिलता है। भगवान श्रीश्रीराधा मदनमोहन जी की कृपा से, सभी भक्तों की सेवा करने की इच्छा से, हम इस उत्सव का आयोजन कर रहे हैं।
मनुष्य अन्न खा कर केवल अपने शरीर को तुष्ट करता है। जबकि भगवान का भक्त भगवान की लीलाओं का रसास्वादन कर अपने शरीर, आत्मा, मन, बुद्धि, आदि सभी को तुष्ट करता है।
इस अद्भुत उत्सव में श्रीराम गोविन्द स्वामी, श्रीमुकुन्द दत्त प्रभु, श्रीब्रजसुन्दर प्रभु जैसे श्रेष्ठ भक्त विभिन्न विषयों पर चर्चा करेंगे।
http://www.vina.cc/2017/05/17/1st-international-bhagavata-mahotsava-europe/

शुक्रवार, 26 मई 2017

क्यों नहीं पहचान पाये राजा ज़रासन्ध श्रीकृष्ण को?

महाराज मुचुकुन्द सूर्यवंश में आविर्भूत हुए थे।  देवताओं के अनुरोध पर महाराज मुचुकुन्द ने बिना सोये निरन्तर काफी लम्बे समय तक असुरों के अत्याचार से देवताओं की रक्षा की थी। जब देवताओं नो स्वर्ग के रक्षक सेनापति के रूप में कार्तिकेय मिल गये तो उन्होंने महाराज मुचुकुन्द को और अधिक कष्ट देना नहीं चाहा। सन्तुष्ट होकर वे महाराज मुचुकुन्द से बोले - हे राजन! आप ने बिना शयन किये हमारे प्रहरी के रूप से बहुत कष्ट सहन किया है, इसलिये अब आप विश्राम कीजिये। आपने हमारा पालन करने के लिए मृत्युलोक के राज्यसुख तक का परित्याग किया है। समस्त विषय-भोगों का त्याग किया है। विशेष बात तो यह है कि इस अन्तराल अमें आप के पुत्र, स्त्री, मन्त्री एवं प्रजा सभी काल के मुख में जा चुके हैं। उनमें से अभी कोई भी नहीं है। पशुपालक जैसे पशुओं को इधर-उधर हाँकता है, उसी प्रकार काल भी खेल करता-करता प्राणियोंं को इधर-उधर परिचालित करता है। हे राजन! हम प्रसन्न होकर आप को आशीर्वाद करते हैं। आप मुक्ति को छोड़कर बाकी कुछ भी हम से वरदान में माँग सकते हैं, क्योंकि मुक्ति तो केवल श्रीविष्णु ही दे सकते हैं।                                            
                                                                                           महाराज 
मुचुकुन्द ने देवताओं की वन्दना की और देवताओं से लम्बी नींद की माँग की।                                                                                   
देवता उनकी इच्छा से बहुत हैरान हुए, किन्तु बोले -- ठीक है, ऐसा ही होगा। यदि कोई आपकी निद्रा भंग करेगा तो वह उसी समय भस्म हो जायेगा। वर प्राप्त कर महाराज मुचुकुन्द एक गुफा में आकर सो गये।

वृहद्रथ राजा के पुत्र ज़रासन्ध मगधदेश के महाप्रभावशाली राजा थे। ज़रासन्ध को एक वरदान प्राप्त था कि जब तक उसको समान रूप से बीच में से चीर कर फेंका नहीं जायेगा तब तक उसकी मृत्यु नहीं होगी। उसकी दोनों पुत्रियों 'अस्ति' और 'प्राप्ति' का विवाह महाराज कंस के साथ हुआ था। श्रीकृष्ण ने महाराज कंस को मारा था, इसी कारण से ज़रासन्ध की श्रीकृष्ण से शत्रुता हो गयी। उसने सतरह बार मथुरा पर आक्रमण किया था
किन्तु हर बार श्रीकृष्ण से हार ही मिली थी।

महर्षि गर्ग ने महादेवजी के वरदान से महाप्रभावशाली पुत्र प्राप्त किया था। यवन राजा के यहाँ प्रतिपालित होने के कारण उसका नाम कालयवन हुआ। ज़रासन्ध ने शिशुपाल के मित्र शाल्व के माध्यम से कालयवन से मित्रता की। ज़रासन्ध की प्रेरणा से कालयवन ने मथुरा पर आक्रमण किया तो श्रीकृष्ण ने द्वारिका भाग जाने की लीला की।  इससे कालयवन को विश्वास हो गया कि श्रीकृष्ण उसके पराक्रम से भयभीत हो गये हैं। उसने जब दूसरी बार श्रीकृष्ण को देखा तो वह श्रीकृष्ण के पीछे दौड़ा। 
श्रीकृष्ण कुशलतापूर्वक उसे दौड़ाते-दौड़ाते उस गुफा में ले आये जहाँ पर महाराज मुचुकुन्द सो रहे थे। श्रीकृष्ण वहाँ पहुँच कर अन्तर्हित हो गये। श्रीकृष्ण जब कहीं नहीं दिखे तो कालयवन ने गुफा में सोये हुए व्यक्ति को श्रीकृष्ण समझकर उसे पैर से ठोकर मारी जिससे महाराज मुचुकुन्द की निद्रा भंग हो गयी। नींद टूटने पर मुचुकुन्द ने आँखें खोलीं तो मुचुकुन्द की दृष्टि खुलने मात्र से ही कालयवन भसम हो गया। श्रीकृष्ण के महातेजोमय स्वरूप को सामने दर्शन करके राजा मुचुकुन्द ने सशंकित होकर उनके चरणों में प्रणाम किया और बोले -- आप के असहनीय तेज के प्रभाव से मेरा तेज फीका पड़ गया है। मैं बार-बार प्रयास करने पर भी लगतार आपके दर्शन नहीं कर पा रहा हूँ। आप समस्त प्राणियों के आराध्य हैं।

ज़रासन्ध और कालयवन सक्षात श्रीकृष्ण को देखकर भी भक्ति न होने के
कारण श्रीकृष्ण के भगवत्-स्वरूप की उपलब्धि नहीं कर पाये। धार्मिक व भक्तिमान मुचुकुन्द के ऊपर श्रीकृष्ण की कृपा-दृष्टि होने के कारण वे श्रीकृष्ण के भगवत्-स्वरूप को पहचान पाये। 

श्रीकृष्ण अपना तत्त्व समझाते हुए राजा ने बोले -- महाराज मुचुकुन्द! पूर्वकाल में आपने मुझसे प्रचुर रूप से कृपा प्राप्त करने के लिए प्रार्थना की थी। इसलिए अनुग्रह पूर्वक गुफा में उपस्थित होकर मैंने आपको अपन स्वरूप दिखाया है। 

राजा मुचुकुन्द ने तब श्रीकृष्ण को प्रणाम किया व वंशागति श्लोकों से उनका स्तव किया। 

श्रीकृष्ण ने संतुष्ट होकर कहा -- मैंने आपसे वरदान माँगने के लिए कहा। किन्तु आप विषयों की ओर आकृष्ट नहीं हुए। आपमें मेरे प्रति इसी प्रकार इसी प्रकार की अटूट भक्ति बनी रहे। मेरे मन लगाकर आप इच्छानुसार पृथ्वी पर विहार करें।