रविवार, 27 नवंबर 2016

आपने एक मुर्दे को अपना शिष्य बना लिया

श्रीसारंग ठाकुर, श्रीचैतन्य महाप्रभुजी के पार्षद हैं। आपने गंगा के किनारे किसी निर्जन स्थान में तीव्र भजन करके अलौकिक शक्ति प्राप्त की थी। 

शिष्य बनाने से भजन में विघ्न होगा, ऐसी आंशका से, श्रीसारंग ठाकुर का शिष्य न बनाने का संकल्प लिया था। किन्तु श्रीचैतन्य महाप्रभुजी आपको शिष्य बनाने के लिये बार-बार प्रेरित करने लगे। 
एक दिन ऐसे ही जब आपको श्रीचैतन्य महाप्रभु जी का आदेश प्राप्त हुआ तो श्रीसारंग ठाकुर जी ने संकल्प लिया कि कल को प्रातः काल आप जिसको भी देखेंगे, उसी को शिष्य बना लेंगे। 

अगले दिन सुबह आप गंगा नदी में स्नान करने गये। स्नान करते हुये आपके पैरों को किसी ने स्पर्श किया। आपने सोचा की इस समय पैरों में क्या छू रहा है। जब उस वस्तु को उन्होंने उठाया तो वह एक मुर्दा व्यक्ति था। 

आपको अपना संकल्प याद आ गया, तब आपने उस मुर्दे को पुनर्जीवन देकर उसे जीवित कर दिया। फिर उसे अपना शिष्य बना लिया। 

यह शिष्य ही श्रीठाकुर मुरारी के नाम से प्रसिद्ध हुये। श्रीसारंग ने नाम के साथ 'मुरारी' युक्त होने पर इनका शार्ङ्ग मुरारी नाम हुआ।

श्रील सारंग ठाकुर की जय!

शनिवार, 26 नवंबर 2016

संसार में सबसे सुखी कौन?

महाभारत में एक प्रसंग आता है, कि एक बार पाँच पाण्डव वन में भटक गये। भटकते-भटकते उन्हें प्यास लगी। ज्यादा थकावट के कारण सभी एक स्थान पर बैठ गये।

युधिष्ठिर महाराजजी ने पहले नकुल, फिर सहदेव, फिर अर्जुन और अन्त में भीम को भेजा जल की खोज में। जब काफी समय हो गया, कोई नहीं लौटा तब युधिष्ठिर महाराज चिन्तित हुये व स्वयं जल व भाईयों की खोज में निकले। कुछ दूर जाने पर एक सरोवर दिखा व समीप ही अपने भाईयों को मृत पड़े देखा। अपने चारों भाईयों की ऐसी अवस्था देखकर बहुत हैरान हुये व सोचने लगे कि घाव का कोई चिन्ह भी नहीं, तो भी मेरे बलशाली, शूरवीर भाई मृत कैसे? 
धैर्य नहीं खोया! जल की प्यास सताई तो समीप के सरोवर से पानी पीने के लिये उठे। स्वच्छ जल जैसे ही अँजुली में भरा तभी एक ध्वनि हुई,'आप ऐसे जल नहीं पी सकते। जल पीने से पहले आपको मेरे प्रश्नों का उत्तर देना होगा अन्यथा आपकी भी वही हालत होगी जो आपके भाईयों की हुई है।'

युधिष्ठिर महाराज ने सिर उठा कर देख कि एक बगुला प्रश्नों के बारे में
कह रहा है। युधिष्ठिर महाराज ने कहा,'एक बगुला मेरे भाईयों को मार सकता है, ऐसा मैं विश्वास नहीं कर सकता। आप कौन हैं? अपने वास्तविक रूप में आयें।' तब बगुले ने यक्ष का रूप धारण कर लिया और कई प्रश्न किये। बहुत महत्व्पूर्ण प्रश्न हैं, वे सभी। उन्हीं में एक प्रश्न था कि संसार में सबसे सुखी कौन है?
युधिष्ठिर महाराज जी ने उत्तर दिया कि संसार में सबसे सुखी व्यक्ति वह है जो अॠणी है, अर्थात् जिस पर कोई ॠण नहीं है। 

यहाँ पर युधिष्ठिर महाराज केवल धन की बात नहीं कर रहे हैं, उनका कहने का तात्पर्य है समस्त प्रकार के ॠण।

आज के जगत् में आम धारणा हो गयी है धन का ॠण लेने की। कोई होम लोन (Home Loan) ले रहा है तो कोई बिस्नस लोन (Business loan), कोइ पर्सनल लोन (Personal loan) ले रहा है तो कोई पढ़ाई के लिये ॠण (Study loan) ले रहा है। अब तो रोज़मर्रा की वस्तुयें भी उधार मिलने लगी हैं। 
थोड़ा सा अगर हम ध्यान दें तो जब हम पर महीने के प्रारम्भ में किसी मासिक किश्त को उतारने का बोझ आ जाता है तो हमें एक तरह से चिंता लग जाती है। हमारे ही देश में कुछ समय पहले कृषि उत्पादकों ने इसी ॠण की परेशानी में आत्मदाह तक कर लिया था। अभी तक तो हम केवल धन के ॠण के कारण ही चिन्तित हैं, अन्य ॠण का तो हमें ध्यान ही नहीं है।

हमारे शास्त्र हमें बताते हैं कि सभी मनुष्य पाँच प्रकार के ॠण से ग्रस्त हैं।
वे हैं ॠषि ॠण, देव ॠण, माता-पिता का ॠण, अन्य प्राणियों का ॠण तथा राजा का ॠण्। ॠषियों ने हमें ज्ञान दिया, देवता हमें वर्षा-धूप-अनाज, इत्यादि देते हैं, माता-पिता हमें बचपन से प्रारम्भ कर सभी कुछ सिखाते हैं, प्राणी मात्र के कारण हमें कपास, अनाज, बने-बनाये मकान, मोटर कार, जहाज, इत्यादि मिलते हैं। राजा अपनी प्रजा का अपने पुत्रों की तरह पालन करता है, सुरक्षा प्रदान करता है, आदि । अतः हम सब इनके ॠणी हैं।


बैंक की किश्त अगर कुछ महीने ना चुकाओ तो वे ॠण (लोन) देना तो बंद करते ही हैं, साथ ही साथ वह वस्तु भी हमसे छीन लेते हैं। उपरोक्त पाँच प्रकार के ॠण देने वालों में से कोई एक भी अगर ॠण देना बंद कर दे तो सोचिये हमारी क्या अवस्था होगी? धन के ॠण के बिना तो हम जीवन निकाल ही लेंगे परन्तु अनाज, हवा, पानी, इत्यादि के बिना तो हम जी ही नहीं पायेंगे। 

सोचिये तो कितना उपकार है इन सबका हम पर।


कोई भी जगत् का व्यक्ति अपकारी अथवा एहसान-फरामोश नहीं कहलवाना चाहता। अब यह जो पाँच प्रकार के ॠण हैं, इनको चुकाये बगैर तो हम सुखी नहीं हो सकते। राजा का ॠण तो हम टैक्स, इत्यादि देकर चुका देते हैं, परन्तु बाकी तो देते ही नहीं। फिर मजे की बात यह है कि कोई व्यक्ति दुःख नहीं चाहता बल्कि सुख ही चाहता है। अब जब ॠण चुकाये बगैर कोई सुखी नहीं हो सकता तो इसका कोई उपाय तो होगा?
हमारे शास्त्र इसकी युक्ति बताते हैं। वह है भगवान की शरण। भगवान की शरण लेने से वे हमें समस्त प्रकार के ॠणों से मुक्त कर देते हैं। सारी सृष्टि के मूल में भगवान हैं। जैसे किसी पौधे के मूल अथवा जड़ में जल देने से उसके पत्ते, टहनी, इत्यादि सबको जल मिल जाता है। केवल पत्ते या टहनी को जल देते रहने से समस्त वृक्ष को जल नहीं मिलता। उसी प्रकार एक-एक ॠण उतारने से सभी ॠण चुकते नहीं हो सकते। बेहतर है कि हम सभी ॠण देने वालों के मूल में जो हैंं अर्थात् सभी के जो स्रोत हैं, श्रीकृष्ण, उनकी शरण में जायें। भगवान श्रीकृष्ण की शरण में जाने से ही हम सुखी हो सकते हैं।

श्रील कालिया कृष्ण दास

आप श्रीकृष्ण लीला में द्वादश गोपालों में से एक श्री लवंग सखा हैं। आप ही भगवान चैतन्य महाप्रभु जी की लीला में श्रील कालिया कृष्ण दास जी के रूप में प्रकट हुये।                                                                                                            
श्रीमहाप्रभु जी की दक्षिण भारत की यात्रा के समय जो काला कृष्ण दास जी श्रीमहाप्रभु जी के कौपीन व बहिर्वास तथा जल पात्र को सम्भालते थे, जिनको कि श्रीनित्यानन्द प्रभु जी ने महाप्रभु जी के साथ दिया थ -- वे काला कृष्ण दास जी इन काला कृष्ण दास जी से अलग हैं।  
  आप श्रीहरिनाम के प्रचार के लिये पावना नामक स्थान पर आये थे।  आप वैष्णवों में अग्रणी थे। आपके लिये सर्वस्व श्रीनित्यानन्द प्रभु ही थे।

श्रील  कालिया कृष्ण दास जी की जय !!!

शुक्रवार, 25 नवंबर 2016

भगवान हर परिस्थिती में अपने भक्त की रक्षा करते हैं।

महाभारत का युद्ध चल रहा था। दोनों पक्ष के सैनिक, योद्धा मार-काट मचा रहे थे। कभी किसी का पलड़ा भारी तो कभी किसी का। पितामह भीष्म बहुत वेग से युद्ध कर रहे थे। अपने वचन के अनुसार वे पाण्डव पक्ष के दस सहस्र योद्धा रोज़ाना मार देते थे। 

जब युद्ध प्रारमभ हुआ था तब कौरवों के पास ग्यारह अक्षौहिणी सेना थी। एक अक्षौहिणी अर्थात् 109350 पैदल सैनिक, 65610 घुड़सवार, 21870 हाथी पर सवार सैनिक, 21870 रथ पर सवार सैनिक। कुल मिलाकर 218700 सैनिक। 

वैसे एक हाथी, एक रथ पर सवार, तीन घुड़सवार तथा पाँच पैदल सैनिक मिल कर एक पत्ती कहलाते हैं, तीन गुणा अर्थात् 3 हाथी, 3 रथ पर सवार, 3 घुड़सवार तथा 15 पैदल सैनिक सेना-मुख कहलाता है। तीन सेना-मुख, गुल्म, तीन गुल्म एक वाहिणी, तीन वाहिणी एक पूतना, तीन पूतना एक चमू, तीन चमू एक अनीकिनि और दस अनीकिनि मिल कर एक अक्षौहिणी बनाती है। दिन पर दिन दोनों पक्षोंं के सैनिक गिनती में कम होते जा रहे थे परन्तु दुर्योधन इससे प्रसन्न नहीं था। वह जिनको मरते हुए देखना चाहता था, पितामह भीष्म अपने बाणों की दिशा उनकी ओर कर ही नहीं रहे थे।
ऐसे में एक रात वह पितामह भीष्म के पास गया। उसने उन्हें प्रणाम किया व बोला,'पितामह! आपका आश्रय पाकर हम देवों, इत्यादि को भी परास्त कर सकते हैं, फिर इन पाण्डवों की गणना ही क्या है, किन्तु मुझे लगता है कि स्नेह के कारण आप पाण्डवों पर आक्रमण नहीं करना चाहते।'

पितामह भीष्म ने दुर्योधन की ओर देखा। उसकी आवाज़ में घबराहट के चिन्ह थे व अद्भुत आशंका की घबराहट भी, फिर भी पितामह भीष्म को उसकी बात रुचि नहीं। 
उन्होंने पाँच बाण निकाले व बोले,'दुर्योधन! तुम शिखण्डी को अर्जुन से दूर रखो, क्योंकि वह पहले स्त्री था। वह जिधर रहेगा, मैं उधर वार नहीं करूँगा। कल का युद्ध कल्प के अन्त तक सब याद करेंगे। मैं इन बाणों से पाण्डवों का वध कर दूँगा।' 
दुर्योधन का चेहरा प्रसन्नता से खिल उठा क्योंकि वह जानता था कि पितामह जो बोलते हैं, वैसा ही करते हैं। उसने पितामह को प्रणाम किया व अपने शिविर में चला गया।

रात का घना अन्धेरा था, परन्तु दुर्योधन को नींद नहीं आ रही थी। वह अपने शिविर में प्रसन्नता से इधर-उधर टहल रहा था।
उस समय कोई और भी निद्रा छोड़, टहल रहा था। इतनी बड़ी घटना के उपरान्त शरणागत रक्षक भगवान कैसे निश्चिन्त हो सकते थे। वे अर्जुन के पास गये और उसे उठाया। वे बोले,'अर्जुन! तुम्हें याद है, जब तुम दुर्योधन को गन्धर्वों से छुड़ा कर लाये थे तो उसने तुम्हें एक वरदान देने का वादा किया था। जाओ, उसे याद दिलाओ और उस वरदान के बदले उसके वस्त्र माँग लो।'
अर्जुन तुरन्त दुर्योधन के पास गया व जैसे भगवान ने उसे समझाया था, वैसा नाटक करते हुये उसे उस वरदान की बात याद दिलाते हुये कहा,'ना जाने राजा हसरत मन में ही रह जाये, इसलिये एक दिन राजा के वस्त्र पहन कर ही तसल्ली कर लूँ। आप सिर्फ आज की रात के लिये अपनी राजकीय पोशाक मुझे दे दें ताकि मैं देख सकूँ कि मैं राजा के वस्त्रों में कैसा दिखता हूँ।'

दुर्योधन से वस्त्र लेकर जब वे आये तो भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि इन वस्त्रों को पहनो और दुर्योधन बन कर पितामह से वे बाण माँग लाओ। 

अर्जुन व दुर्योधन की कद-काठी एक सी थी व चेहरा भी मिलता-जुलता था।
अर्द्ध-रात्रि में अर्जुन चुपचाप पितामह के शिविर में गए व दुर्योधन की तरह प्रणाम कर वे पाँच बाण माँग लिए। पितामह ने उन्हें बाण थमा दिये। जैसे ही अर्जुन बाहर जाने लगे, पितामह बोले,'अर्जुन!' अर्जुन ठिठक कर रुके व घूमे। 'अर्जुन! मुझे नींद नहीं आ रही थी। मैं सोच रहा था कि मैंने दुर्योधन के आगे प्रण तो कर लिया कि कल के युद्ध में इन बाणों से पाण्डवों का वध कर दूँगा परन्त साथ ही मैं सोच रहा था कि उनके रक्षक सर्वशक्तिमान भगवान श्रीकृष्ण हैं, वे उनका वध होने नहीं देंगे। अब रात-रात में उनको बचाने के लिये क्या लीला करेंगे? अच्छा अर्जुन! तुम अकेले तो आये नहीं होगे, वो छलिया कहाँ है?; पितामह ने पूछा।
श्रीकृष्ण ने पितामह की बात सुनकर शिविर में प्रवेश किया। पितामह भीष्म ने उन्हें प्रणाम किया व कहा,'प्रभु! मैं यही सोच रहा था कि भक्त-रक्षक आप कैसे इन पाण्डवों की रक्षा करेंगे। आप धन्य हैं व आपके भक्त भी धन्य हैं, जिनके कल्याण के लिये आप निरन्तर सतर्क रहते हैं।

कहने का तात्पर्य यह है कि भगवान अपने भक्त की हर स्थिती में रक्षा करते हैं।
भगवान ने गीताजी में भी कहा है,'जो लोग अनन्यभाव से मेरे दिव्यस्वरूप का ध्यान करते हुये मेरी पूजा करते हैं, उनकी जो आवश्यकतायें होती हैं, उन्हें मैं पूरा करता हूँ और हर प्रकार से उनकी रक्षा करता हूँ।

आपने पानी को शहद कर दिया

एक बार भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभु जी व श्रीमन् नित्यानन्द प्रभुजी बंगाल में श्रीखण्ड नामक स्थान पर गये।

वहाँ पर दोनों श्रील नरहरी सरकार ठाकुर को मिलने उनके घर पर गये।

कुछ देर बातचीत करने के उपरान्त उन्होंने आपसे मधुपान की इच्छा व्यक्त की।

भगवान की इच्छा पूरी करने के लिये श्रील नरहरि सरकार ठाकुर घर के पास वाले तालाब के पास गये और अपनी शक्ति के प्रभाव से आपने तालाब के जल को शहद में बदल दिया। उससे आपने श्रीगौरांग महाप्रभु व श्रीनित्यानन्द जी की प्यास बुझाई।

आज भी वह तालाब मधुपुष्करिणी के नाम से प्रसिद्ध है।

भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं में आप मधुमती प्राणसखी हैं।

श्रील नरहरी सरकार ठाकुर की जय!!!!!