मंगलवार, 31 अक्तूबर 2017

जब आपने एक ही समय में दो शहरों में भक्तों को सम्बोधित किया

श्रील भक्ति सिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर प्रभुपाद के शिष्य श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज 'विष्णुपाद' जी एक बार भारत के प्रदेश आसाम में प्रचार में थे । आसाम में श्री चैतन्य गौड़ीय मठ के सरल प्रकृति के शिष्य ने श्रीमाधव माहाराज जी को निवेदन किया । उसने कहा कि मेरे पिताजी ने तो अपने जीवन में भजन नहीं किया।  मैं चाहता हूँ कि आपके द्वारा उनका श्राद्ध हो जाये ताकि उनका कल्याण हो जाये। आप मेरे पिताजी के श्राद्ध पर आयें ताकि उनका कल्याण हो । 

श्रीमाधव महाराज जी ने डायरी देख कर बताया कि उस समय तो वे कोलकाता में प्रचार कार्यक्रम में होंगे क्योंकि उन दिनों वहाँ सम्मेलन चल रहा होगा। उन्होंने उस शिष्य को कहा कि उस समय तो मेरा आना मुश्किल है किन्त मैं योग्य व्यक्तियों को  भेज दूँगा। बड़ी विनम्रता से उस भक्त ने कहा कि आपके आने से बहुत अच्छा होता। 
कोलकाता में प्रचार कार्यक्रम के दौरान श्रीमाधव महाराज जी ने अपने गुरु भाई (श्रील प्रभुपाद के शिष्य) श्री कृष्ण केशव दास ब्रह्मचारी, श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज जी तथा श्री मंगल निलय ब्रह्मचारी को आसाम भेजा। ट्रेन लेट होने के कारण आप समय पर वहाँ नहीं पहुँच पाये। जब आप उनके घर से कुछ दूरी पर थे, तो आपने देखा कि सभी लोग प्रसाद पाकर हाथ धो रहे हैं। ऐसे समय पर वहाँ जाना, श्री मंगल निलय ब्रह्मचारी ने अपना अपमान समझा। और साथियों से निवेदन किया कि हमें वहाँ नहीं जाना चाहिये, क्योंकि उन्होंने हमारी प्रतीक्षा नहीं की । वैसे प्रोग्राम खत्म भी हो गया है।                                                                                                                   
श्रील तीर्थ महाराज जी ने कहा कि आपकी बात ठीक है परन्तु हमार कोई दोष नहीं , हमारी ट्रेन लेट हो गयी। दूसरी बात जब कोलकाता जायेंगे तो  गुरुजी पूछेंगे कि प्रोग्राम कैसा रहा, तब हम क्या जवाब देंगे कि हम वहाँ गये ही नहीं ? श्रीकृष्ण केशव प्रभुजी ने भी श्रीतीर्थ महाराज जी की बात को सही ठहराया। और फिर तीनों उनके घर पहुँच गये। 

उनको देख कर सभी भक्तों में खुशी की लहर दौड़ गयी और सभी के मुख पर एक ही प्रश्न था कि आप श्रीमाधव महारज के साथ क्यों नहीं आये ? आप उनके साथ आते तो और भी अच्छा होता। श्रील केशव प्रभु जी ने कहा हमारे मठ का कोलकाता में सम्मेलन चल रहा है,  इसलिये श्रीमाधव महाराजजी नहीं आये और उन्होंने हमको भेजा है। सभी भक्तों के चेहरे देख कर ऐसा लग रहा था कि जैसे वे इनकी बात सुन कर हैरान हों। 

तब सबकी ओर से जिन भक्त के पिताजी का श्राद्ध था, वे बोले कि आप क्या बात करते हैं , श्रील गुरुदेव, माधव महाराज जी तो यहाँ आये थे। उन्होंने पहले प्रवचन किया, उपदेश दिये । उन्होंने स्वयं सारा अनुष्ठान किया, अभी थोड़ी देरे पहले ही यहाँ से वे निकले। 
उनकी बातें सुन कर ये तीनों के तीनों हैरान हो गये। और सोचने लगे यह कैसे सम्भव है ? भक्तों ने आप तीनों को सारी जगह दिखाई जहाँ श्रीमाधव महाराज जी ने प्रवचन किया, पूजा की, श्राद्ध करवाया, प्रसाद पाया । उसके बाद आप लोगो ने स्नान इत्यादि करके प्रसाद पाया, रात को संकीर्तन किया भक्तों के साथ, और अगले दिन वापिस चल पड़े ।

कोलकाता पहुँच कर आपने भक्तों को सबसे पहले यही पूछा कि आज कल प्रवचन कौन कर रहा है ? सभी ने जवाब दिया कि गुरु महाराज जी तथा अन्य सन्नयासी जन। आप लोगों ने पूछा कि क्या बीच में एक दो दिन गुरुजी कहीं गये थे, अथवा यहाँ नहीं थे? उत्तर मिला कि नहीं वो तो रोज यहाँ पर प्रवचन कर रहे हैं । बल्कि परसों तो उन्होंने स्वयं संकीर्त्तन भी किया। सब मठ के महात्माओं की बात सुनकर आपको हैरानी हुई। 

सामान रख कर आप सीधे श्रीमाधव महाराज के कमरे में गये। प्रणाम इत्यादि होने के बाद श्रीमाधव महाराज जी ने आपके हाल-चाल पूछे, यात्रा /कार्यक्रम के बारे में पुछा , इत्यादि । जवाब में श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज जी ने कहा, ' हमारी ट्रेन थोड़ा लेट हो गयी थी परन्तु वहाँ भक्तों से सुना कि वहाँ की सारा पूजा, श्राद्ध, प्रवचन, इत्यादि सब आपने किया। श्रीतीर्थ महाराज जी की बात सुन कर श्रीमाधव महाराज जी मुस्कुराये। पुन: श्रीतीर्थ महाराज जी ने उनसे जानना चाहा कि यह कैसे सम्भव हुआ कि एक ही समय पर आप कोलकाता में यहाँ पर संकीर्त्तन / प्रवचन कर रहे थे भक्तों के साथ, और उधर दूर आसाम में भी उसी समय आप प्रवचन, पूजा और श्राद्ध कर रहे थे। इसके जवाब को श्रीमाधव महाराज जी टाल गये। और कहा कि बहुत दूर से आये हो, हाथ इत्यादि धोकर प्रसाद पाओ। 

शुक्रवार, 27 अक्तूबर 2017

राधा-गोविन्द जी की अष्टकालीय लीला

गोपाष्टमी अथवा धेनु पूजा के दिन नन्द महाराज जी ने भगवान श्रीकृष्ण को गाय चराने के लिये भेजा था। इससे पहले भगवान केवल बछड़े ही चराने के लिये जाते थे। 
नन्द महाराज जी के यहाँ 9 लाख गायें थीं, जो साधारण नहीं थीं। वे सब शान्त रस की भक्त थीं।

वैसे तो श्रीश्रीराधा-दामोदर जी की सभी लीलायें मधुर हैं किन्तु यह और भी मधुर है।  

सुबह-सुबह सभी सखा नन्द-भवन में आकर यशोदा मैय्या को बोलते हैं की 
लाला कहाँ है? जब माता यशोदा कहती हैं की वो तो अभी सो रहा है तो सखा कहते हैं -- माँ ! उसे उठाओ, अभी हमने दूध दुहना है, फिर गोचारण के लिये जाना है। माता के उठाने पर भगवान उठ जाते हैंं।

सखाओं के साथ गोशाला में जाते हैं, जहाँ लगभग  नौ लाख गायें हैं, बछ्ड़े हैं। ये सभी शान्त रस के भक्त हैं। इनको आनन्द देने के लिये भगवान गोशाला में जाते हैं। भगवान इनको दर्शन देते हैं, स्पर्श करते हैं। वैसे तो गायें भगवान के स्पर्श से ही दूध देना शुरु कर देती हैं, फिर भी लीला रसास्वादन के लिये भगवान कभी-कभी दूध भी दुहते हैं। सारा दूध नन्द-भवन में रख कर,  भगवान फिर सभी सखाओं के साथ स्नान को जाते हैं। 

इधर यशोदा माता देखती हैं की राधा अपनी सखियों के भोजन बनाकर जा चुकीं हैं। तब यशोदा माता भोजन श्रीकृष्ण-सखाओं को परोसती हैं।  श्रीकृष्ण उसके बाद गो-चारण के लिये जाते हैं। इधर माता यशोदा सेविका के हाथ राधाजी के लिये भगवान का प्रसाद भेजती हैं।

चौरासी कोस की वृज मण्डल परिक्रमा के समय एक बार श्रील गुरुदेव, ॐ 
विष्णुपाद 108 श्रीश्रीमद् भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराजजी ने बताया कि एक बार जब श्रीकृष्ण अपने सखाओं के साथ बछड़े चराने के लिये जा रहे हैं, तो मार्ग में एक सखा कहता है - कन्हैया! ओ कन्हैया! इधर आ। भगवान जब उसके पास आते हैं तो वो कहता है - वो देख। वो पेड़ पर आम लगा है। भगवान - तो। सखा - अरे! उसे हम तोड़ेंगे और तुझे खिलायेंगे। बहुत मीठा होगा। भगवान - ठीक है, पर वो पेड़ देखा है। कितना बड़ा है। हम कितने छोटे हैं। कैसे पकड़ेंगे आम को? सखा - आम ऊपर है, तो भी तू चिन्ता न कर। अपने दोनों हाथ पेड़ पर लगा और सिर को झुका के रख। 
भगवान तो भक्त के अधीन हैं। भक्त-वत्सल हैं। भक्त की हर इच्छा को पूरी कर देते हैं। दोनों हाथ पेड़ पर लगाकर सिर झुकाकर खड़े हो गये। । सखा भगवान के कन्धे पर चढ़ गया और पेड़ का सहारा लेकर खड़ा हो गया। दूसरे सखा को बुलाकर अपने ऊपर चढ़ने को कहा। दूसरे सखा ने पहले कृष्ण जी पर पैर रखे, फिर सखा पर, फिर उनके दोनों के ऊपर पेड़ के सहारे खड़ा हो गया। 

इस प्रकार पाँच सखा एक के ऊपर एक खड़े हो गये और सबसे नीचे हैं 
भगवान्। सबसे ऊपर वाले सखा ने आम तोड़ा। देखने में तो मीठा लग रहा था किन्तु उसने सोचा की कहीं ये आम फीका या कड़वा या खट्टा न हो। कन्हैया को तो मीठा आम ही देना चाहिये। यह सोचकर उसने वो आम कपड़े से साफ किया और थोड़ा चूसा। फिर उसने नीचे वाले मित्र को आम देते हुये कहा - ले यह आम ले! कन्हैया को दे। बहुत मीठा है। मैंने खा के देखा है।

नीचे वाला मित्र सोचता है -- ये हमेशा कृष्ण का मज़ाक बनाता है। हो सकता है यह आम खट्टा हो जिसको खाने से कृष्ण के दांत खट्टे हो जायेंगे, फिर यह उसका मज़ाक उड़ायेगा। मैं पहले खा कर देखता हूँ। दूसरे मित्र ने भी उस आम को थोड़ा चूस कर देखा। फिर उसने अपने से नीचे वाले सखा से कहा - ले यह आम ले! कन्हैया को दे। बहुत मीठा है। हम दोनों ने खा के देखा है। । 

तीसरा सोचता है - कहीं ये दोनों मज़ाक न कर रहे हों। उसने भी चख के, चूस के देखा…इस प्रकार पाँचों ने आम को चूस कर देखा, फिर वो श्रीकृष्ण तक पहुँचा। 

भगवान तो भक्त - वत्सल हैं। भक्त की जूठन भी प्रेम से खाते हैं क्योंकि उसमें भक्त का प्यार है। अपने भक्त की भक्ति को समृद्ध करने के लिये, उनके आनन्द को बढ़ाने के लिये, भगवान ने सभी सखाओं का जूठा आम जिसमें थोड़ा सा रस बचा था, उसे बड़े प्रेम से खाया। 

इस प्रकार पूरा दिन सखाओं के साथ भगवान विभिन्न लीलायें करते रहते 
हैं। जब कृष्ण थक जाते हैं तब सखा उनको गोद में लिटा देते हैं, कोई उनके चरण दबाता है, तो कोइ बाज़ू, कोई पत्ते की हवा करता है तो कोई शीतल जल पिलाता है। इस प्रकार भगवान की सुबह की लीला चलती रहती है। 

भगवान के लिये सुबह का नाश्ता राधाजी बनाती हैं। वो हुआ यूँ की एक बार दुर्वासा मुनि, राधाजी के पिताजी श्रीवृषभानु राज के यहाँ आये। श्रीवृषभानु जी ने उनके चरण धोये, आरती की, बिठाया। दुर्वासा मुनि के भोजन की इच्छा होने पर, श्रीवृषभानु जी ने राधाजी को रसोई करने के लिये कहा। श्रीमती राधाजी ने बहुत से व्यंजन बनाये। दुर्वासा जी ने भोजन खाया। उन्हें इतना अच्छा लगा कि उन्होंने श्रीवृषभानु जी से पूछा - यह 
भोजन किसने बनाया है, उसे बुलाइये। जब श्रीवृषभानु जी ने राधाजी को बुलाया तो दुर्वासा मुनि ने कहा - मैं इसको आशीर्वाद देता हूँ की इसके हाथ का बना भोजन जो भी खायेगा, उसकी लम्बी आयु हो जायेगी।

यह बात जब माता यशोदा को पता चली तो उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। उनका तो सारा ध्यान अपने गोपाल में ही है। मन ही मन यशोदा माता ने सोचा की यह जो आशीर्वाद दुर्वासा मुनि, राधाजी को दे गये हैं, उसका फायदा उठाना चाहिये। अगर राधा मेरे लाला के लिये भोजन बनायेगी, तो मेरे लाला की उम्र लम्बी हो जायेगी। 

वैसे तो भगवान पर-ब्रह्म हैं, सनातन हैं, और राधा जी सर्व-शक्तिमयी हैं, तो भी यशोदा मैय्या का इतना स्नेह, वात्सल्य की उस भक्ति स्तर पर उनको यह भान ही नहीं की मेरा लाला परब्रह्म है। लाला की लम्बी उम्र की भावना से माता ने अपनी सेविका को राधाजी के पास भेजा और उन्हें अपने पास बुलाया। उन्होंने राधा जी से कहा - देख लाली! आज से तेरी जिम्मेवारी है, मेरे लाला के लिये नाश्ता बनाने की। मेरे कन्हैया के लिये रोज़ दिन का पहला भोजन तुम ही बनाओगी। 

इस प्रकार प्रातः काल माता यशोदा के बुलाने पर राधाजी अपनी सखियों के साथ नन्द-भवन आने लगीं।
श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज जी ने एक दिन अपने निजी सेवक को बताया कि जब राधाजी नन्द भवन में रसोई बनाने आती हैं तो पकाने में इस्तेमाल से पहले,  धुले हुये बर्तनों को एक बार धोना होता है और फिर कपड़े से सुखाना पड़ता है। यह जो सेवा है, यह श्रील गुरु महाराज जी की है। 

जब राधाजी रसोई बनाती हैं, उस समय श्रीकृष्ण शयन कर रहे होते हैं। राधाजी चुपके-चुपके उनके दर्शन के लिये बीच-बीच में जाती हैं। भगवान भी अधखुली आँखों से चोरी-चोरी राधाजी को देखते हैं। यह एक बाल लीला है। दोनों ही तब बहुत छोटे हैं। 

शुक्रवार, 20 अक्तूबर 2017

इस प्रकार गोवर्धन जी वृज - भूमि पर आये

श्रीकृष्ण ने अवतरण से पहले अपने निज-धाम चौरासी कोस भूमि, गोवर्धन और यमुना नदी को पृथ्वी पर भेजा। गोवर्धन भारत के पश्चिम  प्रदेश में, शालमली द्वीप में द्रोण पर्वत के पुत्र के रूप में अवतीर्ण हुये। 

एक बार पुलस्त्य मुन तीर्थ भ्रमण कर रहे थे। मार्ग में विचित्र पुष्प व फलों वाले वृक्षों एवं झरने वाले परम रमणीय द्रोणाचल-नन्दन गिरिराज गोवर्धन को देखकर बड़े प्रसन्न हुये। 
मुनि द्रोणाचल से मिले और उनसे बोले - मैं काशी में रहता हूँ, काशी में गंगाजी हैं और विश्वेश्वर महादेव जी हैं, वहाँ जाने से पापी लोग भी तत्क्षण मुक्त हो जाते हैं। मेरी इच्छा है कि मैं गोवर्धन को काशी में स्थापित पर उस पर तपस्या करूँ। आप अपना पुत्र मुझे दान में दे दें। उस समय गोवर्धन का आकार आठ योजन (चौंसठ मील) लम्बा, पाँच योजन तक फैला तथा दो योजन ऊँचा था।  

(आजकल गोवर्धन की लम्बाई सात मील देखी जाती है, हालांकि परिक्रमा 
का रास्ता चौदह मील का है)

गोवर्धन ने एक शर्त पर मुनि के साथ जाना स्वीकार किया, वह ये कि मुनि यदि भारी समझ कर उन्हें रास्ते में कहीं भी नीचे उतार देंगे तो गोवर्धन वहीं रह जायेंगे। 

पुलस्त्य मुनि ने गोवर्धन को अपनी हथेली पर उठाया और धीरे-धीरे काशी की ओर चलने लगे। मार्ग में वे वृजमण्डल आये। वहाँ के अपूर्वे सौन्दर्य के दर्शन करते ही गोवर्धन को श्रीकृष्ण की बाल्यलीला, किशोर लीला आदि स्मरण हो आयी। श्रीगोवर्धन की वहीं ठहरने की इच्छा हो गयी। उन्होंने अपना भार इतना बढ़ाया कि उस भार से परेशान होकर मुनि अपनी प्रतिज्ञा भूल गये। मुनि ने प्रतिज्ञा की थी की वे रास्ते में गोवर्धन जी को नहीं उतारेंगे, सीधा काशी ले जायेंगे। 

अधिक भार होने के कारण मुनि ने श्रीगोवर्धन को वहीं उतार दिया। पुलस्त्य मुनि ने थकान के कारण थोड़ी देर विश्राम किया, फिर गोवर्धन को उनकी हथेली पर आने के लिये कहा। श्रीगोवर्धन ने इन्कार कर दिया। मुनि फिर उन्हें अपनी शक्ति से उठाने का प्रयास किया किन्तु सफल नहीं हुये। अन्ततः मुनि ने क्रोध में श्राप दिया - तुम ने मेरा मनोरथ पूर्ण नहीं किया इसलिये प्रतिदिन तुम्हारा तिल के समान आकार कम होता जायेगा।

तभी से गोवर्धन पर्वत एक-एक तिल करके छोटे हो रहे हैं। 
कहते हैं जब तक पृथ्वी पर भगीरथी गंगा और गोवर्धन गिरि हैं तब तक कहीं भी कलि के प्रभाव की प्रबलता नहीं होगी।

स्वयं भगवान श्रीकृष्ण जी ने श्रीगोवर्धन जी के तत्त्व को और उनकी महिमा को प्रकाशित किया है। श्रीकृष्ण ने ही देवताओं की पूजा बन्द करवाकर श्रीगोवर्धन पूजा का प्रवर्तन किया।

'गोवर्धन' शब्द का एक अर्थ इन्द्रीय-वर्द्धन भी होता है। इसलिये ऐसा भी कहा जाता है कि श्रीकृष्ण तथा कृष्ण-भक्तों के इन्द्रिय-वर्द्धन का नाम हो गोवर्धन पूजा है। 

रविवार, 15 अक्तूबर 2017

पवित्र कार्तिक महीने में -- वृज दर्शन -- मानसी गंगा

मानसी गंगा एक अ-समान आकार का कुण्ड है। कुसुम सरोवर के प्राय ढेड़ मील दक्षिण-पश्चिम की तरफ ये मानसी गंगा तीर्थ अवस्थित है।

भगवान श्रीकृष्ण के मानस-संकल्प से यह सरोवर प्रकट हुआ है इसलिये इसका नाम हुआ मनसी-गंगा।

कहा जाता है कि एक बार श्रीनन्द महाराजजी व माता यशोदा देवीजी ने गंगा स्नान करने के लिये यात्रा प्रारम्भ की और रात को गोवर्धन के सान्निध्य में वास किया।

यात्रा को जाते देख श्रीकृष्ण ने मन-मन में सोचा कि सब तीर्थ तो इस वृज में विराजित हैं। किन्तु मुझ में प्रणय-विह्वल सरल वृजवासी इस विषय में बिल्कुल नहीं जानते। अतः मैं वृजवासियों को भी इस विषय में बताऊँगा।

श्रीकृष्ण द्वारा विचार करते ही नित्यकृष्ण किंकरी गंगाजी मकर वहिनी 
रूप से समस्त वृजवासियों के दृष्टिगोचर हुईं। साक्षात् गंगा जी को देखकर सभी वृजवासी आश्चर्यचकित रह गये। श्रीकृष्ण उनसे बोले - देखो, इस वृज में विराजित सब तीर्थ ही वृजमण्डल की सेवा करते हैं, और आप ने वृज के बाहर जाकर गंगा स्नान का संंकल्प किया था। पता लगने पर गंगादेवी स्वयं आपके सम्मुख प्रकट हुईं हैं इसलिये आप जल्दी से गंग़ा स्नान कर लीजिये। अब से यह तीर्थ मानसगंगा के नाम से जाना जायेगा।

कार्तिकी-अमावस्या तिथि को ये मानस गंगा प्रकट हुई थी इसलिये दीपावली को मानसी गंगा में स्नान और गंगा परिक्रमा एक महा मेले के रूप में परिणित हो गया है।
श्रील रघुनाथ दास गोस्वामीजी ने वृजविलास के स्तव में मानसी गंगा को श्रीराधा कृष्ण जी का नौका विहार का स्थान बताया है।

गुरुवार, 12 अक्तूबर 2017

इस प्रकार राधा कुण्ड प्रकट हुआ।

एक बार भगवान श्रीकृष्ण ने अरिष्टासुर को मारा। उस दिन जब आप श्रीमती राधा जी से मिलने गये तो श्रीमती राधाजी ने मिलने से मना कर दिया क्योंकि उनके अनुसार श्रीकृष्ण ने एक बैल को मारा था, चाहे वो एक दैत्य ही क्यों न था? बैल को मारने के कारण वे अपवित्र हो गये थे। अतः जब तक श्रीकृष्ण सभी तीर्थों के जल में स्नान नहीं कर लेते, तब तक वे अपवित्र ही रहेंगे।

भगवान श्रीकृष्ण यह सुन कर हँस पड़े। भगवान ने जैसे ही अपने चरणों से पृथ्वी को दबाया, तभी सारे तीर्थों का जल लिये एक कुण्ड वहाँ प्रकट हो गया। श्रीमती राधा व उनकी सखियों के विश्वास के लिये सारे तीर्थ सभी के सामने श्रीकृष्ण को अपना-अपना परिचय देकर उनका पूजन करने लगे। 

भगवान ने फिर उस में स्नान किया।

कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि की आधी रात को यह घटना हुई।

इस प्रकार श्याम कुण्ड प्रकाशित हुआ।

जब श्रीकृष्ण ने सखियों सहित श्रीमती राधा जी से कुछ मज़ाक में कहा तो वे सब एक अन्य कुण्ड की खुदाई करने लगीं। देखते ही देखते वहाँ एक और सरोवर खुद गया, किन्तु उसमें जल नहीं था। यह देख सभी गोपियाँ चिन्तित हो गयीं। 

तब श्रीकृष्ण ने फिर मज़ाक में कहा - मेरे कुण्ड का जल ले लो और अपना सरोवर भर लो। 

गोपियों ने कहा - वृषासुर को मारने से जो पाप हुआ, उसे इस कुण्ड में धोया होने के कारण, इस का जल पवित्र नहीं रहा। हम मानसी गंग़ा से जल लेकर आयेंगीं। 
तब श्रीकृष्ण के ईशारे पर सभी तीर्थ श्रीमती राधाजी के आगे खड़े होकर उनका स्तव करने लगे।  श्रीमती राधाजी के हामी भरते ही, श्याम कुण्ड का जल बड़ी तेजी से राधा-कुण्ड की ओर उछला। उससे राधा-कुण्ड भी भर गया।

इस प्रकार राधा कुण्ड प्रकट हुआ।

भजन स्थानों में श्रीराधा कुण्ड हि सर्वश्रेष्ठ है।